क्या मैं ही हूं, जिसे बिना मर्ज़ी के फ़ैमिली WhatsApp ग्रुप में धकेला गया?

मेरी ज़िदंगी में सब कुछ सही चल रहा था, चीड़िया चहचहा रही थी, मोर बरसात में नाच रहे थे, कुत्ते खंभे पर मूत्रविसर्जन कर रहे थे. कम शब्दों में कहूं, तो जिसको जैसा होना था वैसा था. फ़िर मेरे एक रिश्तेदार ने मेरे रामराज्य को बिगाड़ने की कोशिश की. मुझसे पूछा, बेटा ये WhatsApp क्या होता है? मैं अचानक आई इस मुसीबत को भांप गया, मैं समझ गया था आगे क्या होने वाला है. तपाक से बोला, ‘कुछ नहीं अंकल, ऐसे ही लौंडे-लपाड़ों की बकैती है. आप फ़ोन में नहीं डालना, नया-नया फ़ोने लिया है, हैंग होना स्टार्ट कर देगा’. अंकल उस वक्त अपनी ज़िंदगी से खिलवाड़ कर सकते थे, फ़ोन से नहीं. आप इतना समझो कि उन्होंने अपने नए-नवेले फ़ोन के टेम्पर्ड ग्लास को टेम्पर्ड ग्लास लगा रखा था. फ़ोन हैंग होने के डर ने WhatsApp संवाद का शीघ्रपतन कर दिया.

सुख भरे दिन बीते रे भईया…

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अपनी जीत की खुशी में मैं सामने बिस्तर पर बैठी बड़ी मुसीबत को अनदेखा कर गया. सामने बिस्तर पर मेरा छोटा भाई चादर की तरह बिछा हुआ था. हमारी बातें सुनने के बाद वो अंडरटेकर की तरह उठा और बोला, ‘अरे अंकल कुछ नहीं होता, ये सब झूठ-झूठ बोल रहा है, लाइए हम इंस्टॉल कर देते हैं, बहुत सही चीज़ होती है WhatsApp’ और अगले 20 मिनट तक अंकल की How To Use WhatsApp क्लास चली. प्रोजेक्ट में अंकल को ग्रुप बनाने के लिए दिया गया. अंकल ने कांपती उंगलियों से एक ग्रुप बनाया और उसमें मुझे और मेरे छोटे भाई को जोड़ दिया. मुझे लगा चलो बात आई-गई में ख़त्म हो जाएगी. लेकिन रेत में सिर धंसा लेने से रेगिस्तान की आंधी नहीं रुकती.

मुसीबत की शुरुआत

रातों-रात अंकल ने अपनी WhatsApp सेना खड़ी कर दी थी, ख़ुद सभी वरिष्ठ रिश्तेदारों को सेनापति (Admin) बना दिया था. मेरे पापा भी सेनापतियों में से थे, मुझे लगता है इन सेनापतियों का काम था कि उनकी नीचे रहने वाले छोटे-छोटे सैनिक कभी सेना से बगावत कर के ग्रुप छोड़ने से रोकना. मैंने कई बार ग्रुप छोड़ने की कोशिश की, लेकिन हर बार पापा ने घसीट कर वापस Add कर दिया.

फॉर्वर्ड मैसेज

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जब लाख जतन के बाद ग्रुप छोड़ नहीं पाया, तो सालभर के लिए Mute पर डाल दिया. पूरी तरह नहीं, लेकिन इससे कुछ तो राहत मिल गई. मुझे गुड मॉर्निंग मैसेज से दिक्कत नहीं थी, एक वक्त के बाद मैं आदी हो चुका था. असली दिक्कत थी ’11 लोगों को शेयर’ करने वाले मैसेज से. इसकी वजह थी मेरी मां. हर मां की तरह मेरी मां भी धार्मिक है और वो सच में मानती है कि मैसेज फॉर्वर्ड न करने से शाम तक बुरा होता है. एक बार बिल्ली दूध क्या पी गई, मां की आस्था और गहरी हो गई. कितनी बार तो घर आए मेरे दोस्तों का फ़ोने ले कर उन्होंने उनके 11 दोस्तों को मैसेज फॉर्वड किया है. इस वजह से मेरे दो दोस्तों का ब्रेकअप हुआ, बाकियों ने मेरे घर आना छोड़ दिया.

मेरी खुन्नस

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इतने से भी मुझे कुछ ख़ास दिक्कत नहीं थी. अच्छा हुआ फोकटिया दोस्ता का आना बंद हुआ, साले मुफ़्त का वाई-फाई यूज़ करने आते थे. बात आपे से तब बढ़ गई जब रिश्तेदारों ने मम्मी-पापा से शिकायतें करनी शुरु कर दी. उन्हें मुझसे उनके अश्लील जोक्स पर रिप्लाई चाहिए थे, जो मैं दो साल पहले सुन चुका था. ऊपर से पापा की नसीहत कि किसी को रिप्लाई करो तो पहले प्रणाम ज़रूर कर लिया करो. कभी रिप्लाई कर भी दिया, तो बातचीत बीच में नहीं रुकती, बीच में छोड़ा मतलब मेरे संस्कार अच्छे नहीं हैं, मम्मी से शिकायत कर दी जाएगी.

रोज़-रोज़ की बातें

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मेरे फ़ैमली WhatsApp ग्रुप में बातचीत का एक पैटर्न मैंने नोटिस किया है. सुबह-सुबह सब अपने हिस्से का Good Morning मेसेज भेजते हैं, कुछ फूल वाला तो कुछ भगवान वाला. इसके बाद ग्रुप के सभी पति सदस्य ‘पति-पत्नी’ वाले जोक्स भेजेंगे. एक-दूसरे के मैसेज पर ‘हा हा’ के रिएक्शन का सिलसिला अभी चल ही रहा होता है कि कोई पत्नी महिला सदस्य झंडा उठा लेती है, इसके बाद सारी औरतें उसके पीछ-पीछे चली आती हैं, धीरे-धीरे ग्रुप से मर्दों की जमात गायब हो जाती है और महिलाओं का कब्ज़ा होता है. अब बात होती है दोपहर के खाने, सीरियल, घर की परेशानियां आदी की. इस बीच जोक्स आते-जाते रहते हैं. ग्रुप में मौजूद मेरी उम्र का एक भी सदस्य एक्टिव नहीं रहता, सिवाय ‘पापा की परी’ और एक ‘म्माज़ ब्वॉय’ के.

समाधान

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अगर आपको लगता है कि मैं आपको फ़ैमली WhatsApp ग्रुप से बचने का समाधान बताने वाला हूं, तो इस आर्टिक्ल को यहीं पढ़ना बंद कर दो, क्योंकि मुझे ख़ुद भी नहीं पता. उल्टा आप कोई तरकीब जानते हैं, तो मुझे भी बता देना. मुझे भी आज़ाद होना है.

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